Saturday, March 26, 2011

ज़ुल्फ़

चेहरे पे गिरी ज़ुल्फ़ हटा क्यों नहीं देते,
तुम चाँद से मुखड़े को दिखा क्यों नहीं देते,

माना ये मैंने, शर्म से है, लब सिले हुये,
आँखों से दिल की बात जता क्यों नहीं देते,

रस्म-ओ-रिवाज़ सदियों से दुश्मन हैं प्यार के,
कोई और जहाँ मिल के बसा क्यों  नहीं  देते,

तुम हो सनम खुदा तुम्हें, इस दिल का वास्ता,
हर फ़ासले ऐ यार मिटा क्यों नहीं देते,


हल-ऐ-दिल " बेबस" को बता क्यों नहीं देते,

हुज़ूर


ये दिल बहुत उदास है, बहलाइये हुज़ूर,
कब से बुला रहा हूँ मैं, पास आइये हुज़ूर,

बैठा हूँ कब से आपके दीदार के लिए,
तड़पे हुओं को और न तड़पाइये हुज़ूर,

आये हैं अभी आप अभी चल दिये कहाँ,
रौनक है आप बज़्म की रुक जाइये हुज़ूर,

महफ़िल में मैं, पियूँ न पियूँ, पर है इल्तिजा,
हर जाम मेरे नाम से छलकाइये हुज़ूर,

हमने वफ़ा किया हमीं, कहलाये बेवफा,
"बेबस" पे इस तरह न सितम ढाइये हुज़ूर,

Friday, March 25, 2011

नक़ाब रुख़ से

नक़ाब रुख़ से हटाओ, तो बात बन जाये,
अगर नज़र से पिलाओ, तो बात बन जाये,

है लुत्फ़ पीने का अब्रा-ओ-सहाब में ऐ सनम,
ज़ुल्फ़ शानो पे गिराओ, तो बात बन जाये,

चांदनी रात है और मस्त हवा के झोके,
अगरचे पहलू में आओ, तो बात बन जाये,

तुम्हारी चेहरे से सरकी है ज़ुल्फ़ मुद्दत में,
तुम आज ईद मनाओ, तो बात बन जाये

हसीन रात है "बेबस" की अगर कोई  ग़ज़ल,
जो दिल के साज़ पे गाओ, तो बात बन जाये

रुख़ हवाओं का

पहले दुनिया को, समझ लीजिये, 
फिर कही जा के, सनम कीजिये,

हुस्न एक, बुलबुला है पानी का,
रुख़ हवाओं का, समझ लीजिये, 

खेल कहते नहीं, मुहब्बत को,
दिल है पारा सा, समझ लीजिये, 

उनकी बातों पे यकीं, उफ़ ! तौबा,
रेत का घर है समझ लीजिये,

मैं कोई "मीर", नहीं हूँ "बेबस",
एक अदना सा, समझ लीजिये 

Tuesday, March 22, 2011

ग़ज़ल

मेरे जज़्बात, कोई क्या जाने
दिल के हालात, कोई क्या जाने

पागलों की तरह से, रहते हैं,
एख्तेलाफात,  कोई क्या जाने,

जो गुज़ारे है, बन्द कमरे में,
ऐसे लम्हात, कोई क्या जाने,

बाद मुद्दत, किसी का मिलना हो,
वो मुलाक़ात, कोई क्या जाने,

जिसने काटी न हो, कभी "बेबस"
वो सियह रात, कोई क्या जाने,

Monday, March 21, 2011

madira ka jeewan

मैं इक रोज़ गया मदिरालय, प्यास बुझाने अपने मन की,
तब मदिरा ने व्यथा सुनाई, मुझको अपने जीवन की,
बोली मदिरा रोकर मुझसे, ऐ मुझको पीने वालों,
तुम तो प्यास बुझाते मुझसे, मेरी प्यास बुझाए कौन ?


मैं इंसा के तन में मिलकर, उसे मस्त कर देती हूँ,
और स्वयं एकाकी होकर, चुपके-चुपके रोती हूँ,
पान किया लुक-छुप के मेरा, इन उजले चोले वालों ने,
और उछाला कीचड़ मुझपे, बैठ के भरी सभाओं में,


क्या मेरा अस्तित्व नहीं, या छिना कुछ जग वालों का,
इतना ज़ुल्म सहूँ मैं क्यों? इन धर्म के ठेकेदारों का,
खता बता, जग क्या है मेरी, व्यर्थ मुझे बदनाम ना कर,
स्वयं ही पान करें सब मेरा, मेरे सर इलज़ाम ना धर,


अबला हूँ ? क्या इसीलिए, जग मुझपर इतना ज़ुल्म  करे,
सहने  की सीमा ही नहीं, फिर कौन कहाँ तक सहन करे,
देवता मुझे सोमरस कहते, दानव मुझे शराब कहे,
मानव कितना स्वार्थी निकला, पीकर मुझे ख़राब कहे ?


मुझपे  अब तक कवियों ने, लिख डाली लाखों कवितायें,
समझ सका ये जग फिर भी ना, मेरे मन की पीडाएं,
किसकी शिकायत किससे करूँ, हर पल ये सोचा करती हूँ,
भाग्य लिख मिट सकता नहीं, "बेबस" हूँ हर दुःख सहती हूँ