Monday, March 21, 2011

madira ka jeewan

मैं इक रोज़ गया मदिरालय, प्यास बुझाने अपने मन की,
तब मदिरा ने व्यथा सुनाई, मुझको अपने जीवन की,
बोली मदिरा रोकर मुझसे, ऐ मुझको पीने वालों,
तुम तो प्यास बुझाते मुझसे, मेरी प्यास बुझाए कौन ?


मैं इंसा के तन में मिलकर, उसे मस्त कर देती हूँ,
और स्वयं एकाकी होकर, चुपके-चुपके रोती हूँ,
पान किया लुक-छुप के मेरा, इन उजले चोले वालों ने,
और उछाला कीचड़ मुझपे, बैठ के भरी सभाओं में,


क्या मेरा अस्तित्व नहीं, या छिना कुछ जग वालों का,
इतना ज़ुल्म सहूँ मैं क्यों? इन धर्म के ठेकेदारों का,
खता बता, जग क्या है मेरी, व्यर्थ मुझे बदनाम ना कर,
स्वयं ही पान करें सब मेरा, मेरे सर इलज़ाम ना धर,


अबला हूँ ? क्या इसीलिए, जग मुझपर इतना ज़ुल्म  करे,
सहने  की सीमा ही नहीं, फिर कौन कहाँ तक सहन करे,
देवता मुझे सोमरस कहते, दानव मुझे शराब कहे,
मानव कितना स्वार्थी निकला, पीकर मुझे ख़राब कहे ?


मुझपे  अब तक कवियों ने, लिख डाली लाखों कवितायें,
समझ सका ये जग फिर भी ना, मेरे मन की पीडाएं,
किसकी शिकायत किससे करूँ, हर पल ये सोचा करती हूँ,
भाग्य लिख मिट सकता नहीं, "बेबस" हूँ हर दुःख सहती हूँ


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